हैदराबाद दुष्कर्म मामले के चारों आरोपियों की एनकाउंटर में मारे जाने पर दिल्ली में हर जगह खुशी का इजहार किया जा रहा है। लोग एक दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी का इजहार कर रहे हैं। लोग इस तरह की घटना के आरोपियों के प्रति ऐसे ही कठोर कदम उठाए जाने की मांग कर रहे हैं। इसी घटना के बीच कांग्रेस नेता अलका लांबा ने पीएम नरेंद्र मोदी के उस पुराने बयान की याद दिलाई है, जिसमें उन्होंने दुष्कर्म के आरोपियों को सात दिनों में ही फांसी देने की बात कही थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बयान दिसंबर 2012 में निर्भया कांड होने के बाद दिया था। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे।
कांग्रेस नेता ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना पुराना बयान दोबारा सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जब वही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए हैं, वे आरोपियों को फांसी देने का कानून क्यों नहीं बना रहे हैं। कांग्रेस नेता अलका लांबा ने कहा कि जो व्यक्ति सत्ता से बाहर रहता है वह तुरंत फांसी देने की मांग करता है, लेकिन जब वही व्यक्ति सत्ता में पहुंच जाता है तो अपने उन्हीं वायदों को भूल जाता है। इस तरह की सोच से बाहर निकलकर पूरे देश की बेटियों के लिए कानून बनाने में सबको साथ देना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बयान दिसंबर 2012 में निर्भया कांड होने के बाद दिया था। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे।
कांग्रेस नेता ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना पुराना बयान दोबारा सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जब वही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए हैं, वे आरोपियों को फांसी देने का कानून क्यों नहीं बना रहे हैं। कांग्रेस नेता अलका लांबा ने कहा कि जो व्यक्ति सत्ता से बाहर रहता है वह तुरंत फांसी देने की मांग करता है, लेकिन जब वही व्यक्ति सत्ता में पहुंच जाता है तो अपने उन्हीं वायदों को भूल जाता है। इस तरह की सोच से बाहर निकलकर पूरे देश की बेटियों के लिए कानून बनाने में सबको साथ देना चाहिए।
निर्भया के आरोपी कर रहे फांसी का इंतजार
दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भया कांड हुआ था। इसके आरोपियों को कोर्ट फांसी की सजा सुना चुका है। लेकिन तमाम विकल्पों को अपनाते हुए वे अभी भी फांसी की सजा का इंतजार कर रहे हैं। इसी दिल्ली में वर्ष 2012 में 706 दुष्कर्म की घटनाएं हुईं थीं, अब 2019 में यही घटनाएं बढ़कर 1877 से अधिक हो चुकी हैं। इसी मामले में यह ध्यान भी दिया जाना चाहिए कि दिल्ली में आज भी सुप्रीम कोर्ट में 59 हजार से अधिक, दिल्ली हाईकोर्ट में 80 हजार से अधिक और जिला अदालतों में 1.42 लाख मामलों की सुनवाई चल रही है।